Thursday, February 4, 2016

आखिर हिंदी साहित्य का भविष्य कहाँ जा रहा है? A Guest Post by Nilabh Verma and a giveaway!

© Written by Tarang Sinha


नीलाभ वर्मा अशोक चक्रधर जी के साथ 

मेरे विचार में, हिंदी एक कठिन भाषा है. कठिन इसलिए क्योंकि इसे खूबसूरती से व्यक्त करना इतना सहज नहीं जितना प्रतीत होता है. 

आज मेरे ब्लॉग पर नीलाभ वर्मा, हिंदी उपन्यास स्वयंवर (महाभारत के दो विशिष्ट पात्र भीष्म और अम्बा के विचित्र संबंधों पर आधारित) के लेखक हिंदी साहित्य पर अपने विचार या यूं कहें कि अपनी चिंता व्यक्त कर रहे हैं. 

साथ ही, इस ब्लॉगपोस्ट के जरिये आप जीत सकते हैं किताबें! नीलाभ वर्मा की स्वयंवर (हार्डकवर) के 'साथ' आप जीत सकते हैं ३०० रु मूल्य तक की अपनी पसंद की कोई भी 'हिंदी' पुस्तक!

चुनाव आपका होगा. बस हम ये अपेक्षा अवश्य करेंगे कि आप स्वयंवर के बारे में अपने विचार (अपने ब्लॉग, फेसबुक, ट्विटर, अमेज़न, गुडरीड्स पर) ज़रूर व्यक्त करें. स्वयंवर के बारे में एक अति सफल ब्लॉगर के विचार आप यहाँ देख सकते हैं. 

अपने जीवन की हिंदी किताबों अथवा महाभारत की कहानियों से जुडी कोई स्मृति हमारे साथ बाँटें। वैसे तो स्मृतियों को वर्गीकृत नहीं किया जा सकता, परन्तु दिल को छूने वाली दो स्मृतियों को हम पुस्तकें भेंट करेंगे. अपने विचार अवश्य व्यक्त करें. 

अब आगे की बात नीलाभ वर्मा करेंगे. 

आपने विद्द्यालय के दिनों को याद करता हूँ तो चेहरे पे अनायास हीं एक मुस्कान आ जाती है. जब हम नयी कक्षा में जाते थे तो नयी पुस्तकों के प्रति जबरदस्त उत्कंठा रहती थी. मुझे याद है कि जैसे हीं नयी कक्षा की पुस्तकें आती थी तो सबसे पहला काम होता था हिंदी की पुस्तक को पृष्ठ दर पृष्ठ ख़त्म करना. आप लोगों को भी शायद वो दौर याद होगा जब हमारी हिंदी की पुस्तकों में एक से बढ़कर एक रचनाकारों की कहानियां और कवितायेँ हुआ करती थी. आज अगर प्रेमचंद, शरतचंद्र, जयशंकर प्रसाद, फणीश्वर नाथ रेणु, महादेवी वर्मा, रविन्द्रनाथ ठाकुर, अज्ञेय, निराला और भी ना जाने कितने कालजयी साहित्यकार जन जन के चहेते हैं तो इसका एक बड़ा कारण वे पुस्तकें भी हैं जो हमने अपने बचपन के दिनों में पढ़ी थी.

अंग्रेजी साहित्य में हमें ना ज्यादा रूचि थी और ना हीं ज्यादा ज्ञान. उन दिनों अंग्रेजी स्कूल काफी कम हुआ करते थे किन्तु अगर आप उन विद्यालयों के पुस्तकालयों में भी अगर जाते तो वहाँ भी आपको हिंदी पुस्तकों की प्रचुरता हीं मिलती थी. अगर कोई व्यक्ति अंग्रेजी साहित्य पढता हुआ दिख जाता था तो उसके केवल दो हीं निष्कर्ष निकलते थे: एक, वो व्यक्ति बहुत हीं अधिक शिक्षित है और दूसरा, वो पुस्तक किसी महान पाश्चात्य रचनाकार की कृति है. कुल मिलाकर कहा जाए तो उस समय पुस्तक का मतलब होता था "हिंदी पुस्तक". 

आज जब ये सब सोचता हूँ तो लगता है जैसे समय का चक्र पूरा उल्टा घूम चुका है. हिंदी पुस्तके? वो होती हैं क्या? हिंदी माध्यम के विद्यालय? अभी भी चल रहे हैं क्या? ऊपर उल्लेखित लेखक? कौन हैं वे? शायद आपको आज कई अंग्रेजी स्कूल में प्रेमचंद की कहानियां मिल जाएंगी किन्तु छात्र ये नहीं जानते कि उनका हिंदी साहित्य में क्या योगदान है? उनके लिए प्रेमचंद की कहानी सिर्फ एक कहानी है. उनकी दृष्टि में प्रेमचंद और शेक्सपियर में कोई अंतर नहीं है. 

आज अगर कोई व्यक्ति हिंदी की पस्तक पढता दिख जाए तो उसका भी दो मतलब निकलता है: पहला, ये व्यक्ति अंग्रेजी भाषा नहीं जानता और दूसरा, ये काफी पुराने विचारों का व्यक्ति है. अगर आप मेट्रो में सफ़र करते हैं, तो आपको कई लोग मिल जाएँगे जो अपने समय का सदुपयोग पुस्तक पढ़कर करते हैं किन्तु हिंदी पुस्तक पढता हुआ आपको कोई विरला हीं मिलेगा. ऑनलाइन जाइए, पुस्तकों को सर्च कीजिये, १००० अंग्रेजी पुस्तकों पर आपको एक हिंदी की पुस्तक मिलेंगी. कानौट प्लेस जाइए, हर २०० मीटर पर आपको पुस्तक बेचने वाले मिल जाएँगे पर एक भी हिंदी पुस्तक आपको नहीं मिलेगी. किसी भी पुस्तकालय में चले जाएँ, अब वहाँ आपको हिंदी पुस्तकों का एक छोटा सा कोना नजर आएगा जो अंग्रेजी पुस्तकों की भीड़ में जैसे कोई हुई सी नजर आती है. 

नए ज़माने के ऐसे २० साहित्यकार का नाम आपको मालूम होगा जो अंग्रेजी में लिखते हैं पर दिमाग पर पर्याप्त मात्र में जोर देने पर भी २ ऐसे व्यक्ति का नाम आपको नहीं याद आएगा जो हिंदी में लिखते हैं. आज हर दिन अंग्रेजी भाषा का एक प्रतिभाशाली और प्रसिध्द लेखक जन्म लेता है किन्तु हिंदी का आखिरी प्रसिध्द लेखक कौन था, ये सोचने में आपको काफी समय लगेगा. बाज़ार में अंग्रेजी के बेस्ट सेलर्स की बाढ़ सी आई हुई है लेकिन एक भी हिंदी पुस्तक आपको नहीं मिलेगी जिसे पर्याप्त पाठक भी मिल सके. नए लेखकों को तो छोड़ दें, हिंदी साहित्य की स्थिति इतनी भयावह है कि प्रसिध्द और स्थापित हिंदी लेखकों ने भी जैसे लिखना छोड़ दिया है. नरेन्द्र कोहली और अशोक चक्रधर जैसे लेखकों ने लम्बे समय से कुछ नया नहीं लिखा है. 

दुःख होता है किन्तु कारण समझ से परे है. सीधा साधा जवाब ये है कि जब हिंदी के पाठक हीं नहीं हैं तो हिंदी की पुस्तकें और लेखक कहाँ से आयेंगे किन्तु ये परिस्थितियां कब, कैसे और क्यों उत्पन्न हुई, कोई बता नहीं सकता. 

कुछ दिनों पहले मैंने एक हिंदी उपन्यास "स्वयंवर" लिखा था. उसका क्या हश्र हुआ होगा ये बताने की जरुरत नहीं है. मैं खुश था कि भारत के सबसे बड़े प्रकाशकों में से एक मेरी पुस्तक को छापने के लिए तैयार हो गयी है लेकिन जब पुस्तक बाज़ार में आई तो प्रचार के नाम पर प्रकाशक का प्रयास शून्य था. किसी भी तरह से उन्होंने मेरी पुस्तक को प्रचारित करने की आवश्यकता नहीं समझी. मैं कितना निराश हुआ ये मैं बता नहीं सकता. जहाँ वे अंग्रेजी के सामान्य पुस्तकों को भी जोर शोर से प्रचारित कर रहे थे वही मेरा उपन्यास उपेक्षित पड़ा रहा. किस लिए? क्योंकि वो हिंदी में था. काश वे मेरी पुस्तक के लिए कुछ तो करते. केवल एक प्रयास! वो भी मेरे लिए पर्याप्त था. 

संतोष की बात ये रही कि जिन लोगों ने मेरी पुस्तक पढ़ी, उन्होंने बेहतरीन प्रतिक्रिया दी और पाठकों की सकारात्मक प्रतिक्रिया से अधिक महत्वपूर्ण मेरे लिए और कुछ नहीं है चाहे वो केवल एक हीं पाठक हो. 

कुछ लोगों ने मुझे कहा कि मैंने हिंदी में पुस्तक लिख कर गलती कर दी. अगर मैंने यही पुस्तक अंग्रेजी में लिखी होती तो मुझे जबरदस्त प्रतिक्रिया मिलती. कुछ लोगों ने मुझे अपने उपन्यास का अंग्रेजी अनुवाद करवाने का भी सुझाव दिया. सुनकर दुःख भी हुआ और हंसी भी आयी. जिस पुस्तक की पूरी पृष्ठभूमि हीं हिंदी हो उसे अंग्रेजी में कैसे लिखा जाये. जरा सोच कर देखिये कि अगर प्रेमचंद केवल प्रसिद्धी पाने के लिए अंग्रेजी भाषा में लिखते तो क्या वे कलम के सिपाही कहलाते? क्या केवल प्रसिद्धी पाने के लिए किसी पुस्तक की आत्मा को मार देना उचित है? 

क्या मैं आगे कोई पुस्तक लिखूंगा? अवश्य. क्या मैं अपनी इस गलती से सबक लेते हुए उसे अंग्रेजी में लिखूंगा? बिलकुल नहीं क्योंकि मेरे लिए ये कोई गलती नहीं है जिससे मैं सबक ले सकूँ. अगर पाठक पुस्तक की श्रेष्ठता का पैमाना भाषा को मानते हैं तो यही सही. ये मेरी ओर से भी लागू होता है. मेरी पुस्तक की आत्मा हिंदी है और सिर्फ कुछ लाभ के लिए मैं पाठकों के सामने मृत रचना नहीं रख सकता. 

मैं बस उन नवोदित एवं स्थापित लेखकों का आव्हान करना चाहता हूँ जो हिंदी भाषा में लिखने के लिए कटिबद्ध हैं. घबराएँ नहीं, चाहे हिंदी पढने वाले मुट्ठी बार लोग हीं क्यों न हों, पर उनके सामने सजीव और श्रेष्ठ रचना रखना हमारी जिम्मेदारी है. पुस्तकों का चाहे कितना भी व्यापारीकरण हो जाये किन्तु हिंदी के यथार्थ पाठकों का एक समूह है और हमेशा रहेगा. हमें बस उस समूह को विस्तारित करना है और हमेशा ऐसी कृतियों को सामने लाना है जो हिंदी साहित्य में एक मिसाल हो. आज जो प्रकाशक हिंदी साहित्य से नजरें चुराते फिर रहे हैं उन्हें वो दिन भी देखना पड़ेगा जब पाठक अपनी मातृभाषा की ओर फिर से मुड़ेंगे.

मित्रो, हिंदी की वर्त्तमान परिस्थितियां अत्यंत चिंतित करने वाली हैं. आवश्यकता इस बात की है कि ज्यादा से ज्यादा लोग आगे आयें और हिंदी को बढ़ावा दें. ना केवल रचनाकार बनकर बल्कि एक शुध्द पाठक बनकर और उनकी कृतियों को प्रोत्साहित कर के भी, अन्यथा कहीं ऐसा ना हो कि हिंदी साहित्य केवल एक इतिहास बन कर रह जाए.

नीलाभ वर्मा. 

मैं नीलाभ का धन्यवाद करना चाहूंगी और आपसे ये पूछना चाहूंगी की इस बारे में आपके क्या विचार हैं? क्या आप अब हिंदी उपन्यास पढ़ना पसंद करते हैं? 

Giveaway has been extended. It will now end on 31st March 2016. We will announce the winners  on 2nd April 2016

5 comments:

  1. सबसे पहले वेर्माजी को धन्यवाद , हिंदी में लिखने के लिए . जी हाँ मै आज भी हिंदी के उपन्यास पढ़ना पसंद करूँगा. अभी हाल में ही कांच के शामयाने पढ़ी हैं, रश्मि रविजा जी की पहली रचना है .
    विश्वास कीजिये हिंदी के पाठकों की कमी नहीं हैं समाज / बाजार में . हाँ आज के दौर में किताबों की मार्केटिंग जरुरी है .
    अंग्रेजी की औसत किताबें भी बेस्ट सेलर बन जाती क्यों की भाषा विदेशी है कुछ लोग तो भाषा सुधरने हेतु ही खरीद लेते है तो कुछ दिखावे के लिए . बात जब हिंदी की हो तो अपेक्षायें दोगुनी हो जाती है . हिंदी के औसत साहित्य की तुलना हम कालजयी साहित्यों से करने लगते है और एक सच्चे प्रयास को भी पूरी तरह नकार दिया जाता है . और भी कई कारण है हिंदी साहित्य के कम प्रचलित होने के.
    सच मानिये मैंने भी आज के इंग्लिश, प्रचलित भारतीय लेखकों के बेस्ट सेलर पढ़ा है. जिन्हें अच्छी लगी हो, मुझे तो नहीं भाई. युवा हिंदी लेखकों की कहानियां जैसे की दिव्य प्रकाश दुबेजी की मसाला चाय , Terms & Condition Apply , अनु सिंह चौधरी की नीला स्कार्फ, और रश्मिजी की किताब काफी पसंद आई और मित्रों को भी खूब भाई .
    आशा करूँगा आप हिंदी में लिखते रहेंगे .
    हार्दिक शुभकामनाए.

    ReplyDelete
  2. Thanks Sachin, for your comment. I'm glad you like reading Hindi books, and thanks for mentioning some Hindi books. Will try them.

    Why don't you participate in the contest!

    ReplyDelete
  3. I read and understand the general idea of Hindi, difficult words don't know though. But can't write articles in Hindi.Nice to read this.(I am a Keralite).

    ReplyDelete
  4. Hello Rudraprayaga,

    It's so sweet of you to read and comment on this post even when you're not comfortable with this language. Thank you!

    ReplyDelete
  5. Thank you so much Prayaga, and Sachin for participating in the discussion. It's sad that people are not interested in Hindi books even if they are free!

    Prayaga, I know you are non-Hindi reader so, I think you won't be interested in reading the Hindi books. I understand.

    Sachin, if you want to claim the giveaway prize, you may contact the author (Since, there's no way we can get in touch with you). His email id: nilabhverma(at)gmail(dot)com.

    Thanks!

    ReplyDelete