Friday, May 29, 2020

तुम दोस्त हो...






Photo by Clay Banks on Unsplash


तो उसने हां कह दी है। हां, तो कहे भी क्यों ना? 29 साल का हो गया है। शादी की उम्र तो हो ही गई है। इतनी अच्छी नौकरी है। इतना हैंडसम भी है। अनामिका बिल्कुल सही है उसके लिए। उसकी तस्वीर लेकर आया था मेरे पास। उसकी तस्वीर देखकर कौन नापसंद कर सकता था। इतनी खूबसूरत, सक्सेसफुल, मॉडर्न ... मेरी तरह झल्ली थोड़े ही है वो। 

पर मुझे इतनी कोफ़्त क्यों हो रही है? जैसे दिल भिंच रहा हो। क्या इस बात का इंतजार था कि वो मुझे आकर प्रपोज करेगा? हुंह। हंस कर बात कर लेने, थोड़ी हंसी ठिठोली कर लेने और थोड़ा ख्याल रख लेने का क्या मतलब कि वो मुझसे प्यार करने लगा है? और अब मेरी आंखें क्यों गीली होने लगीं हैं? बेवजह।

इतना काफी नहीं था कि उसकी दादी मां ने एक काम थमा दिया है। 'बेटा रश्मि, तुम्हारी पसंद बहुत अच्छी है। आकाश का सूट और अनामिका की ड्रेस तुम ही पसंद कर लेना,' दादी माँ ने कहा था। 'मेरी तो सुनता ही नहीं। ऐसा अनमना सा है कि लगता ही नहीं कि उसकी शादी तय हो गयी है। तुम दोस्त हो उसकी...'

चार दिन पहले कहा था कि आ जाना, कुछ फोटोज़ सेलेक्ट कर के रखूंगी। देखकर पसंद कर ले।

'तुम कुछ ज़्यादा ही एक्साइटेड नहीं हो मेरी शादी को लेकर?' उसने कहा था। छत की मुंडेर पर टिक कर खड़ा, मरुन शर्ट में कितना अच्छा लग रहा था।

मुझे क्या पड़ी है। लगता रहे अच्छा।  हुंह।

फिर अचानक ही उसका लहज़ा बदल गया। शाम गहराने लगी थी, आसमान सिन्दूरी हो चला था, और मानो आसमान की परछाई उसकी गहरी आंखों में उतर आई हो। अपनी आंखें मुझपे टिका कर बोला, 'तुम खुश हो, रश्मि?'

एक सिहरन सी दौड़ गई थी मेरे अंदर। कुछ अलग था उस दिन उसकी आंखों में। और आवाज...इतने मुलायम स्वर में तो शायद ही कभी बात की हो उसने। अपने आप को संयत कर के मैंने कहा, 'उससे क्या फ़र्क पड़ता है, आकाश?' 
मेरी आवाज़ ज़रूरत से ज़्यादा संजीदा थी। और मुझे ये कहने की क्या जरूरत थी?

'फ़र्क तो पड़ता है।' उसने कहा और आसमान की तरफ देखने लगा। पंछियों का झुंड अपने घरों को जा रहा था। 'आखिर तुम मेरी दोस्त हो।' 

अपने चेहरे पर खेलती बालों को समेटते हुए मैंने उसकी तरफ देखा तो मुस्कुरा रहा था। वही चिर परिचित शरारती मुस्कान। 

एक तो मुझे ये 'तुम दोस्त हो' वाले चोंचले बिल्कुल नहीं पसंद। दोस्त हूँ तो क्या उसकी शादी भी करा दूँ?

पर ये हैं कहाँ आजकल? कुछ ज्यादा ही व्यस्त है। लगे होंगे बातों में अनामिका के साथ। या फिर शायद मिलने भी लगे हों। मैं अपने कमरे की बड़ी सी खिड़की से बाहर जाने क्या तलाश रही थी? हवा कुछ सर्द हो चली थी। हाँ, नवम्बर दस्तक दे चुका था। बस बारह दिन रह गए थे उसकी सगाई में। 

'उदास लग रही हो आज।' उसकी आवाज़ आई तो मैं चौंक गई। जाने कहां से आ धमका। कोई आहट भी नहीं हुई या फिर मैं ही कहीं खोई थी। 'मैं क्यों उदास होने लगी?'

'हां, हां, पता है, बहुत खुश हो,' उसने बेपरवाही से कहा और एक चॉकलेट मुझे पकड़ा दी। 'जल्दी दिखाओ, क्या पसंद किया है। अब सगाई का सूट भी तुम्हारी पसंद का ही पहनना पड़ेगा।'

'तो मत पहनो,' मैंने तुनक कर कहा। 'वो तो दादी माँ ने .. '

'अरे, गुस्से में भी लग रही हो।' वो हंस पड़ा। 'अच्छा न, अब जल्दी करो। मुझे भी तुम्हें कुछ दिखाना है।'

वैसे तो कहता है, 'लड़कियों के कपडे मुझे समझ नहीं आते।' पर अनामिका का गाउन तो एक झटके में पसंद कर लिया। और अपने लिए एक नेवी ब्लू सूट। 'शेरवानी बहुत टिपिकल लगता है, यार!' उसने अपनी जेब से एक छोटा, एलिगेंट सा डिब्बा निकालते हुए कहा।

'ये देखो, कैसा है?' उसने डिब्बे को खोलकर, मेरी टेबल पर रखकर पूछा।
कैसा है? इतनी खूबसूरत हीरे की अंगूठी तो कभी इमैजिन भी नहीं की। नहीं इमैजिन तो की है। 'बहुत खूबसूरत है! अनामिका के लिए है?' मैंने पूछा। ओह, मैं भी न, अटपटे सवाल करती हूँ, कभी-कभी। 'अनामिका को बहुत पसंद आएगी और उसकी अंगुलियों पे बहुत अच्छी लगेगी।' 

'तुम्हें कैसे पता?'

'बस पता है।'

'हां, बहुत पता है तुम्हें।' उसने अपनी भवें तरेरकर कहा। 
'चलो मैं निकलता हूँ, बहुत काम है। चाय-वाय तो तुम्हें पूछना नहीं है।' वो जाने लगा तो जी चाहा कि उसे गले लगा लूं, बस एक बार। 
मेरी नज़र टेबल पर गई। 'तुम अंगूठी यहीं भूलकर जा रहे हो।' मैंने आवाज़ दी तो वो धीरे से पलटा और कुछ पलों तक मुझे देखता रहा। उसकी ये नज़रें, उफ़! 

'नहीं,' उसने सर हिला कर कहा। 'भूलकर नहीं जा रहा। इसे इसकी सही जगह पर रखकर जा रहा हूं।'

क्या कहा इसने!?

वहीं दीवार पर टिक कर खड़ा हो गया। इतना गंभीर तो इसे शायद ही कभी देखा है। 'तुम इजाज़त दो, तो इस अंगूठी को इससे भी ज़्यादा सही जगह पे रख दूं?' उसने मेरे बायीं हथेली की ओर इशारा करके कहा।

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