Tuesday, June 22, 2021

एक मुट्ठी आसमान...

 



Image: My Painting



'वो नहीं आएगी अब।'


महिमा के कानों में आकांक्षा के स्वर अब तक गूंज रहे थे। आकांक्षा यूं तो महिमा से काफ़ी छोटी थी पर दोस्त जैसी थी। अकसर उसके पास आया करती। उससे बातें करके मन बहल जाया करता पर आज मन बहुत भारी हो गया था।


'बड़ा सा बैग लेकर गयी है, एक लड़के के साथ। मैंने खुद देखा है दीदी।' आकांक्षा की बड़ी-बड़ी आंखें और बड़ी हो गई थीं। 'और उस लड़के को तो मैंने पहले भी देखा है इधर।'


महिमा ने खिड़की के बाहर नज़र डाली। अपनी मर्ज़ी से बस यही एक मुट्ठी आसमान देख सकती थी वो। आसमान स्याह हो चला था। उसने अपने पति की तरफ़ देखा। छत की ओर टकटकी लगाए जाने क्या ढ़ूंढ़ रहे थे। तिरसठ की उम्र में सत्तर के लगने लगे थे नवीन। वो तो फिर भी किसी तरह चल फिर लेते थे पर महिमा? वो तो उठकर बैठने तक के लिए रश्मि पर निर्भर थी। या फिर नवीन किसी तरह मदद कर देते।


घड़ी साढ़े नौ बजा रही थी। इतनी देर तक तो कभी बाहर नहीं रही रश्मि। तो क्या सचमुच रश्मि अब वापस नहीं आएगी? वो सचमुच एक बड़ा सा बैग लेकर गयी थी। उसने पूछा तो 'कुछ काम है।' कह कर चली गयी। आजकल थोड़ी अलग-अलग रहने लगी थी। अपने छोटे से कमरे में, अपने आप में मगन।


एक बार को तो महिमा का मन गुस्से से भर गया। इतनी सैल्फ़िश कैसे हो सकती थी उसकी बेटी? पर क्या उसे सेल्फ़िश कहना जायज़ होगा?


पिछले महीने ही बीस की हुई थी। बड़े शौक़ थे उसके। 'मुझे नहीं रहना ऐसे, जैसे तैसे। कुछ बड़ा करना है।'


बारवीं की बोर्ड में बमुश्किल पास हो पायी थी। इसलिये नहीं कि लायक नहीं थी, बल्कि इसलिए कि परिस्थितियों की मार पड़ गई उसे।


पहले महिमा लकवे की शिकार हो गई। और फिर नवीन का शरीर भी लाचार होने लगा। उनकी मामूली सी पेंशन थी और रश्मि की ट्यूशन जो घर किसी तरह चल जाता। 


सत्रह बरस की थी रश्मि बस तबसे सबकुछ सम्भाल रही थी। कोई कब तक झेल सकता है? 

'ये मेरी ज़िम्मेदारी थी, महिमा। इस छोटी बच्ची की नहीं।' नवीन कहते, एकदम निरीह से।


वाकई उसकी अपनी ज़िन्दगी भी तो है? पर अब उन दोनों का क्या होगा? कौन देखेगा? बातें करना अलग बात है और सबकुछ सम्भालना अलग। कमरे में अजीब सा सन्नाटा पसरा था। उसने फिर नवीन की तरफ देखा। नज़रें टस से मस नहीं हुई थीं। शायद वो भी वही सोच रहे थे। 


साढ़े ग्यारह बज गए थे। तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई और दोनों चौंक कर एक दूसरे की ओर देखने लगे। नवीन धीरे से उठे और दरवाज़ा खोला तो सामने एक अजनबी औरत खड़ी थी। नहीं, अजनबी नहीं थी। महिमा जानती थी उसे। कहाँ देखा था?

'जी?' नवीन ने कहा। 


'जी, मैं अदिति।'


अदिति, हां, तकरीबन दस साल पहले इसी इलाके में एक सिलाई सेंटर चलाती थी।


'इधर से ही गुज़र रही थी तो सोचा इसे घर छोड़ दूं।' उसने कहा और तभी उसकी ओट से निकल कर रश्मि घर के अंदर आ गयी। उसके हाथों में वही बैग था पर अब खाली था।


'सॉरी पापा, देर हो गई। दरअसल…' रश्मि ने अदिति की ओर देखा। 'अ..आप अंदर आइए ना!'


'अरे, नहीं। मेरी गाड़ी खड़ी है और काफी रात भी हो गई है। फिर कभी। अब तो मिलते रहेंगे।' अदिति ने मुस्कुराते हुए कहा। फिर उसने महिमा की ओर देखा। 'पहचाना मुझे?'

महिमा ने मुस्कुराने की कोशिश की।


'आपकी बेटी बहुत होनहार है। मेरी बुटिक के लिए इतने बेहतरीन एम्ब्रॉयडरी और पैचवर्क डिज़ाइन्ज़ बनाए हैं। क्लाएंट को बहुत पसंद आए। मीटिंग में थोड़ी देर हो गई।'


अदिति चली गई। 

'बताया क्यों नहीं?'


'कुछ तय नहीं था। मुझे यक़ीन नहीं था कि मेरे डिज़ाइन्स उन्हें पसंद आएंगे। सोचा था बाद में बताउंगी।'


'हमने तो सोचा…?'


'क्या सोचा?'


'आकांक्षा ने कहा तुम अब नहीं आओगी।'


'और आपने मान लिया?'


'हमें लगा…


'हमें नहीं, तुम्हें।' नवीन ने महिमा की बात बीच में काट दी।


'अच्छा? आप भी परेशान थे।'


'हां, तो बेटी इतनी देर घर नहीं आए तो परेशान नहीं होता?'


'वैसे आपने उनकी बात मान कैसे ली?' रश्मि ने कहा।


'मुझे लगा तुम थक गयी हमारा ख़्याल रखते-रखते।'


'आपने भी तो इतने साल ख़्याल रखा मेरा।' रश्मि ने घड़े से पानी निकालते हुए कहा। 'और हां, थक तो गई हूँ। पर आप नहीं जानतीं कि मैं थककर हारने वालों में नहीं हूँ।' रश्मि पानी पीकर किचन की ओर जाते हुए बोली, 'पापा जानते हैं।'


'मतलब?' महिमा ने हड़बड़ा कर नवीन की ओर देखा। 'मतलब आप जानते थे?'


'वो इंपॉर्टेट नहीं है। पर मैं तुम्हारी तरह दूसरों की बातों में आकर ऊलजलूल सोचने नहीं लगता।'



‘This post is a part of Blogchatter Half Marathon.’


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3 comments:

  1. Loved reading this story! I liked how you sketched the character of Rashmi.

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  2. रोचक कहानी। प्रवाह बाँधकर रखता है।

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  3. Google translate worked! Great job with the characters. You have a talent for story telling.

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