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Thursday, October 30, 2025

Magic Box 2: A Delightful Collection of Children's Stories


If you listen to FM Radio, you must have come across Yaadon Ka Box –a wonderful audio storytelling platform, crisp stories full of heart and nostalgia. I feel truly thankful to be part of this amazing team. We are now stepping into Season 8 (my second season).


Last year, Neelesh sir started his own publishing imprint, The Slow Imprint, in association with Ekada (Hindi wing of Westland Books), and published five lovely books, including Magic Box, a well-loved collection of beautiful children stories. 





And now, Magic Box 2 is here, and available for pre-order. It’s a delightful collection of 18 exciting and imaginative children stories (Hindi) published by Ekada Westland and Slow Imprint. I’m thrilled that some of my stories have found a place in this volume too.


This book brings together a wide range of stories –a haunted house, unique friendships, an unusual fight, lessons from the animal world, a dash of fantasy, tales that evoke the innocence of school days, and much more. It’s a perfect fit for buddy reading with your children. 





The Blurb:


A new magic on every page, a hidden friend in every story! And this friend doesn't just laugh and play with children, but with anyone who has a childlike heart. This is Magic Box 2-the second book in the Magic Box series, with stories for children.

Inside the book, you'll find mischievous animals from the jungle, colourful birds, butterflies, curious kids asking questions, parents pondering answers, clouds, rain, sunshine and much more! When children step away from mobile and computer screens and dive into the stories in this book, they'll discover a world that is simple, straightforward and beautiful. Isn't that exactly what we want to give to our children?


Writers: Smriti Sachdev, Dr Ranjana Jaiswal, Anita Sethi, Harsha Chaudhary, Deepak Heera Rangnath, Kinshuk Kaushik and yes, Tarang Sinha too!



This post is part of Blogchatter Half Marathon



Tuesday, November 19, 2024

The Slow Imprint Books by Neelesh Misra: A Fresh Path to the Art of Storytelling


Listening to Yaadon Ka Idiot Box stories had been a part of my life, but at that time, I never imagined I would one day be writing for the show—mainly because I didn’t write Hindi stories back then.


It’s been exactly two years since I became part of Mandali—the wonderful YKIB writers’ team that has allowed me to grow as a writer. We discuss stories and find every possible way to enhance them. It’s always a joy to attend those meetings.


I’m happy to share that Neelesh Sir finally stepped into the world of publishing, amplifying fresh and powerful voices (which I had always expected)—The Slow Imprint, in association with Eka by Westland Books. 


There was a wonderful book launch event yesterday (18th November). While I couldn’t attend the launch, I’m delighted about this new initiative. Happy to share the details.




The Books are on Pre-Orders.

And look at the lovely covers!




Gaon Se Bees Postcards by Shri Shiv Balak Misra,

the father of Neelesh Misra.

He is a geologist, and it’s a fascinating collection of his essays, experiences, and anecdotes.





Main Aksar Sochta Hoon by Neelesh Misra.

I’m sure you know that, apart from being a storyteller, Neelesh Sir is also a Bollywood lyricist with many popular songs to his credit. This book is a collection of poems written by him.





Junglee Phoolon Si Ladki by Anulata Raj Nair

The creative head and producer of YKIB, Anulata Ji writes lyrical and evocative stories across various genres. It’s a collection of her lovely, lovely stories.





My son is particularly looking forward to this book. It features stories by Anulata Raj Nair, Deepak Rangnathan, Anita Sethi, and Deeksha Chaudhary.




It’s a collection of imaginative spiritual tales by Chhavi Nigam, Anulata Raj Nair, Hrushali Jain, Shikha Dwedi, and Anulata Raj Nair.


So here are a variety of stories, and I’m really looking forward to reading them. I hope you find them interesting!


Also, if you enjoy a tale with an unexpected twist, you can pick my Free short story, The Accident, published by Juggernaut Books. 

Sharing with Bookish Leaguehosted by Ritu Bindra

And Blogchatter




Monday, July 1, 2024

मारिया...(My Hindi Translation of Maria by Parvathy)



This is my Hindi translation of a beautiful write up Maria, written by Parvathy. You can read the original post HERE. She writes beautifully. Here's another translation that I did before. 'माँ, मैं और मसाला चाय'




मारिया,

इक रोज़ मेरी किसी से बात हुई कि दिल टूटने के बाद फिर से किसी पे भरोसा कैसे किया जा सकता है…

ऐसा तो नहीं कि सिर्फ इश्क़ में मिलने वाला दर्द ही दुख देता है?

कई और चीज़ें होती हैं जिससे तक़लीफ़ होती है ―जैसे, किसी जगह को अलविदा कहना।

वो पल जब आखिरकार आपको खुद के और किसी अपने के दरमियान एक लकीर खींचनी पड़ जाती है।

जैसे, ना चाहते हुए भी कहीं दूर चले जाना।





उस चीज़ को पाने की कोशिश करना छोड़ देना जिसे आपने कभी दिल से चाहा था।

कई ग़म होते हैं इस दुनिया में, 

पर मोहब्बत में हम जिस दर्द से मुख़ातिब होते हैं, वो सबसे ज़्यादा चोट पहुंचाता है।


मैं नहीं जानता कि फिर से यक़ीन करना कैसे मुमकिन हो सकता है।

शायद हम भूल जाते हैं कि हमारा दिल एक न एक दिन दुख से उबर ही जाता है।

हम उम्मीद के एक क़तरे को थामे रहते हैं,

तब भी जब लगता है कि सबकुछ ख़त्म हो चुका है, ये सोचकर कि एक दिन चीज़ें बदल जाएंगी।


मुझे लगता है कि हम इस तरह ही जी पाते हैं,

आगे बढ़ने की हिम्मत जुटाते हैं और फिर साँसें लेना नामुमकिन सा नहीं लगता।

मुश्किल से मुश्किल दिनों,

और हताश पलों में भी नहीं।


मेरे ख़्याल से अलविदा कहना,

क्योंकि आपको पता है कि यही सही वक्त है,

बड़े साहस का काम है।

जानते बूझते उसे जाने देना

जो कि शायद कभी आपके दिल का सबसे खूबसूरत हिस्सा था।

आगे बढ़ना, फिर से खिल पाना।


पर मन के धागे का एक छोर छूटा रहेगा कहीं,  इस आस में कि कोई इसे फिर से बांधेगा। दिल का एक खाली कोना हमेशा इस इंतज़ार में होगा कि कोई उस सूनेपन को भर देगा।

या फिर हम ज़िन्दगी ये जानते हुए जिए चले जाएंगे कि मन की नीरवता शायद कभी ना भरे। और ऐसा हो तो कोई बात नहीं, है ना?


हमने कभी टूटकर प्यार किया था,

और किसी ने हमें भी उसी शिद्द्त से चाहा था,

क्या ये काफ़ी नहीं?





पता है,

कल मैंने पहली बार एक गाना सुना,

औरों के लिए पुराना हो शायद, पर मेरे लिए वो गाना नया था।

उसे सुनकर मुझे तुम याद आ गयी।

जाने कितनी छोटी-छोटी, नयी सी बातें हैं

जो मैंने एक बक्से में सहेज कर रखी है।

ताकि जब हम कभी मिलें तो उन्हें तुम्हें दे सकूं।

अक्सर सोचता हूँ,

कि क्या तुम भी ऐसा करती हो।


कसम से, मैं ज़िन्दगी काट नहीं रहा,

जी रहा हूँ।

और मुझे उम्मीद है कि बारिश में

तुम्हारे पैर अब भी थिरकते होंगे।



तुम्हारा,
अमोर


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Sunday, June 25, 2023

सफ़ेद गुलाब


Image: Andrew Johnson, Unsplash


खिड़की से छनकर आती मीठी सी धूप कितनी खूबसूरत लगती है, और खुशनुमा। मुझे ये हमेशा तुम्हारी मुस्कुराहट की याद दिलाती है, वो मुस्कुराहट जो तुम्हारे होठों पर बमुश्किल आती है पर जब आती है तो तुम्हारी आँखों में भी बिखर जाती है।

टेबल पर शीशे के बोल में थिरकते सफ़ेद गुलाब ने जैसे धूप का सुनहरा रंग जज़्ब कर लिया है, और उसकी रूपहली चमक शीशे और पानी से टकराती हुई, परछाइयां बनकर टेबल पर छिटक गयी है। और वहीं बगल में रखी हुई उस किताब से झांकता बुकमार्क बुकमार्क नहीं है बल्कि बस का वो टिकट है जो तुम्हारी डायरी से गिर गया था। लायब्रेरी के कोने वाले टेबल पर।


'क्या तुम फिर आओगे?' मैंने ये नहीं पूछा था पर जाने क्यों ये लगा था कि अगले शनिवार को तुम मुझे वहीं मिल जाओगे, लायब्रेरी के कोने वाली सीट पर। और ऐसा ही हुआ। मैं लायब्रेरी में दाखिल हुई और तुमने किताब में गड़ी अपनी नज़रें उठायी, जैसे मेरी आहट को पहचान लिया हो। दिल में अजीब सा कुछ हुआ। तुम्हारी नज़रें मेरे चेहरे से फिसल कर तुम्हारे सामने वाली कुर्सी पर टिक गयी। जैसे कह रही हो, 'यहाँ बैठो ना।' और मैं चुपचाप वहाँ जाकर बैठ गयी। और तुम्हारे होठों पर एक धीमी सी मुस्कान खेलने लगी और फिर धीरे-धीरे ग़ुम हो गयी। 


फिर अगले शनिवार और फिर उसके अगले शनिवार और फिर अगले...आज पाँचवां शनिवार है। लायब्रेरी में बातें करने की इजाज़त नहीं है। पर बातें करना जरूरी है क्या? 


हमेशा की तरह आज भी तुम पहले उठकर चले गये। और हमेशा की तरह दरवाज़े से निकलने से पहले तुमने पलट कर देखा। पर हमेशा की तरह तुम एक पल में गायब नहीं हो गये। तुम्हारी नज़रें मेरे चेहरे पर एक पल को ठहरीं और फिर सरक कर टेबल पर टिक गयीं। आज फिर तुम्हारी डायरी से कुछ गिर गया था। पर वो बस का टिकट नहीं, एक सफ़ेद गुलाब था।



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Wednesday, June 14, 2023

एक चुटकी प्यार...(A story by Namrata, Translated by Tarang)





So, it's Namrata's birthday. She's a writer, reader, editor and a dear (and my first virtual) friend. We met in 2011/2012, I think, through our blogs, however we haven't met yet. :)

Today, I'm posting one of her short stories, 'A Pinch of Love (from her short story collection, Metro Diaries 2) that I translated into Hindi. Thank you, N, for allowing me to translate your lovely story. And happy birthday! 🌻


एक चुटकी प्यार...


'अम्मा…उप्पू…’ (माँ…नमक!)

पद्मा डायनिंग टेबल पर से ही चिल्लाई। फिर अपने उबलते गुस्से को संयत करने के ख़्याल से उसने गहरी साँसें भरीं, जैसा कि उसके योगा इंस्ट्रक्टर ने सिखाया था। आज उसकी माँ ने उसके ही कहने पर नाश्ते में उसका पसंदीदा उपमा बनाया था, पर हर बार की तरह, आज भी नमक डालना भूल गयी थी। 


'ओह, मैं भूल गई।' कहकर उसकी माँ हौले से हँस पड़ी। 'इतनी मामूली सी बात इस तरह कोई कैसे भूल सकता है भला?' उन्होंने कहा और रसोई की ओर चली गयीं। 


पद्मा को अपने स्कूल के दिन याद आ गए जब उसकी माँ अक्सर दूध में चीनी डालना भूल जाया करती। बड़ी कोफ़्त होती थी उसे, सुबह सुबह ही चिढ़ जाती। खाने में नमक डालना भूल जाना तो आम बात थी। अब तो वो आए दिन कोई न कोई नयी बात भूल ही जाती थीं।


पद्मा को वो दिन अच्छी तरह याद था जब वो तेरह बरस की हुई थी, टीनएज का पहला पड़ाव। अपने जन्मदिन के लिए उसने खास तौर पर गुलाबी रंग के फ़्रॉक की फ़रमाइश की थी, मगर माँ वो बात ऐसे भूल गयी जैसे पद्मा ने ये बात कही ही नहीं थी। वो उसके लिए लाल रंग की ड्रेस ले आयी थीं। ठीक है, उस ड्रेस की बहुत तारीफ़ हुई थी पर वो गुलाबी तो नहीं था न। मन का चाहा ना मिलने की तक़लीफ़ एक टीनएज मन ही समझ सकता है। और इससे भी बड़ी बात तो तब हुई जब माँ गैस चूल्हे पर कुछ चढ़ा कर दूसरे कामों में लग गयीं थीं। जब तक वो लौटीं, बर्तन में सिर्फ़ कालिख़ बची थी। 


दस बरस की उम्र तक पद्मा ने इन बातों पर इतना ध्यान नहीं दिया, मगर धीरे-धीरे उसे समझ आने लगा। उसे इस बात से शदीद कोफ़्त होती कि उसके पापा, जो नियमों के इतने पाबंद थे, अपनी बीवी से बेहद प्यार करते थे, वो बीवी जो मिस भुलक्कड़ का अंतरराष्ट्रीय दर्जे का ख़िताब बड़ी आसानी से जीत सकती थीं।


पद्मा ने टीनएज की दहलीज़ पर कदम रखा तो उसे धीरे-धीरे ये समझ आने लगा कि ज़िन्दगी में एक हमसफ़र की अहमियत क्या होती है, और उसके साथ तालमेल बिठाना कितना जरूरी होता है। उसके ज़ेहन में एक साथी की तसवीर उभरने लगी थी और उसे लेकर पहली चीज़ जो उसके मन में आयी वो ये थी कि वो भुलक्कड़ तो बिल्कुल ना हो। 


माँ रसोई से नमक का डब्बा लेकर आयी तो पद्मा भी अपने ख़्यालों से बाहर आ गयी। 'सॉरी, बेटा,' माँ ने कहा और उसके गालों को चूम लिया। 


जाने क्यों मन खिन्न सा हो गया। पद्मा उठकर खड़ी हो गयी और फिर लिविंग रूम की ओर चल पड़ी। उसके पापा अखबार में मशग़ूल थे। 'पापा, बहुत दिनों से आपसे एक बात पूछना चाह रही थी।' पद्मा ने कहा तो उसके पापा अखबार से अपनी नज़रें हटाकर उसे देखने लगे। 'प्लीज़, आप बुरा मन मानिएगा पर आज मुझे मेरे सवाल का जवाब चाहिए।'


'हाँ बेटा, बोलो।' उसके पापा ने अखबार मोड़कर परे सरका दिया। 


पद्मा एक पल को हिचकिचाई, फिर बोली, 'आपने किस तरह माँ जैसी इंसान के साथ इतने साल गुज़ार दिए? मतलब, माँ अच्छी हैं पर उन्हें तो कुछ भी याद नहीं रहता। और आप तो हर चीज़ को बिल्कुल सही तरीके से करने के आदी हैं। आपको माँ के ऐसे स्वभाव से चिढ़ नहीं होती?' पद्मा ने सब एक साँस में ही कह दिया।


पापा धीरे से मुस्कुराए फिर बोले, 'बेटा, जब हमारी शादी हुई थी तब वक्त कुछ और था। हम संयुक्त परिवार में रहते थे। आए दिन घर में कई ऐसी बातें होती रहती थीं जिसे एक युद्ध का आग़ाज़ माना जा सकता था। तुम्हारी माँ उस परिवार का हिस्सा बनी तो मैं पशोपेश में था क्योंकि मैं उसे ठीक से जानता तक नहीं था। पर उसने अपने कोमल स्वभाव से ना सिर्फ सबका दिल जीत लिया बल्कि झगड़े की आहट को हँसी की खनखनाहट में डुबो दिया।' पापा खिड़की से बाहर देखने लगे। दो दिनों की बारिश के बाद आज खिली खिली सी धूप बिखरी थी। 


पापा ने पद्मा की ओर देखा। 'अपनी भूल जाने वाली आदत की वजह से तुम्हारी माँ कई दिल दुखाने वाली बातों को भी भूल जाया करती है। पर एक बात वो कभी नहीं भूलती,' पापा ने कहा तो पद्मा की आँखों में सवाल उतर आया।


'वो क्या?'


'प्यार। जरूरी नहीं कि ज़िन्दगी में सबकुछ याद ही रखा जाए। कभी-कभी कुछ चीज़ों को भूल जाना ही बेहतर होता है। और ये बात मैंने तुम्हारी माँ सीखा है। जब तक वो ज़िन्दगी के उस सच्चे एहसास ―यानि कि प्यार को याद रखती है, क्या फ़र्क पड़ता है कि अगर वो कभी चुटकी भर नमक या चीनी डालना भूल जाए? इतना तो हम मैनेज कर सकते हैं ना?' 


पद्मा के होठों पर मुस्कुराहट तैर गयी और आँखों में थोड़ी नमी। आज उसके पापा ने प्यार की एक नयी परिभाषा दी थी, और ये समझाया था कि प्यार बस एक रूमानी सी तस्वीर नहीं है जो अब तक उसके ज़ेहन में बसी थी। प्यार के कई और खूबसूरत रंग होते हैं।



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Saturday, April 1, 2023

वो चिट्ठियाँ जो लिखी ही नहीं...


Photo: My watercolour painting


अच्छा, सुनो!

उस दिन क्या कहा था तुमने? जब हम गंगा के तट पर मिले थे। पीली साड़ी में तुम ऐसी लग रही थी मानो तुमपर सुबह का सुनहरा रंग उतर आया हो। और जब तुम बातें कर रही थी... तो जैसे तुम्हारी आँखों में नदी की लहरों की चंचलता थिरकने लगी। और फिर...तुमने मेरी आँखों में देखा तो मुझे ऐसा लगा मानो मेरे मन के अंधेरे कोने रौशन हो उठे हों। मैंने नज़रें हटा लीं, और मेरे अंदर एक अजीब सा मीठा शोर उमड़ने लगा। 

मैं जब तुम्हें देखता हूँ तो कुछ सुन नहीं पाता। जानता हूँ कि ये आदत अच्छी नहीं। पर क्या करूँ? 

अगली बार जब तुमसे मिलने आऊंगा तो ये ख़त जो मैंने लिखा है, मेरी जेब में होगा पर वो तुम्हें दे नहीं पाऊँगा। ऐसे कितने ही ख़त हैं जो मेरी स्टडी टेबल की दराज में रखे हैं, और कुछ मेरी अलमारी में, मेरे कपड़ों की तहों के बीच। और जाने कितनी चिट्ठियाँ हैं जो मैंने लिखी ही नहीं, वो जो मैंने अपने दिल में सहेज कर रखी हैं।

तुम्हें अपने मन के कोनों में,
छुपाकर रखना अच्छा लगता है
इक राज़ की तरह...


―तरंग सिन्हा


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Happy to share my recently published works:


My short story in The Hindu

My new Hindi story for Neelesh Misra's show, Yaadon Ka Idiot Box

My article on including Time and Senses in your writing for Blogchatter


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Sunday, January 15, 2023

दिल्ली की सर्दी

 


Image:  Alex Padurariu, Unsplash


'कहाँ रख दिया मैंने अपनी प्यारी टोपी को?' भास्कर ने सोचा। यहीं बिस्तर पर ही तो रखा था शायद। रज़ाई हटाकर, तकियों को हटाकर, यहां तक कि अलमारी में भी देख लिया जहां उसके होने की कोई सम्भावना नहीं थी, पर वो नहीं मिली। एक तो इतनी ठंड से बड़ी कोफ़्त होती है उसे। और उसपर से इन टोपियों और ज़ुराबों की गाहेबगाहे खो जाने वाली आदत बहुत बुरी होती है। बस यही एक टोपी है उसके पास, डार्क मरून रंग की, हाथ से बुनी हुई, जिसे वो घर पे पहनता है। बाहर पहन कर जाओ तो उसके दोस्त कहते, "अरे यार, तुझे कुछ ज़्यादा ही ठंड लगती है। आज के ज़माने में ये वाली टोपी कौन पहनता है? भाभी जी चिढ़ाती नहीं तुझे?"


भाभी जी याने भास्कर की पत्नी नलिनी। वो उसे बहुत चिढ़ाती है, पर अब ठंड लगती है तो लगती है। लोग ना चिढ़ाएं इसके लिए क्या वो फ़न्ने खां बनता फिरे? उसका बस चले तो वो रज़ाई ओढ़कर घूमे। गीतकारों ने दिल्ली की सर्दी पर गाना यूं ही नहीं लिख दिया। उसके मुजफ्फरपुर में तो फिर भी सर्दी थोड़े अदब से आती है पर दिल्ली की सर्दी तो भाई साहब बवाल है। 


नलिनी लेखिका हैं और आजकल स्टडी में बैठी डेडलाइन का पीछा कर रही हैं। भास्कर एक अच्छे पति होने का फ़र्ज निभाते है और उन्हें बिल्कुल डिस्टर्ब नहीं करते। बस लवली-लवली तीन चार दौर चाय का जरूर चलता है।


ये लो, चाय की बात आयी तो अब उसे चाय की तलब होने लगी। और वो चल पड़ा चाय बनाने, मस्त इलायची वाली मीठी, गाढ़ी चाय। नलिनी को ऐसी ही चाय पसंद है। पर किचन में एक बड़ा सा disappointment मुंह बाए खड़ा था, दूध के खाली पतीले के रूप में। यार! अब दूध लाने बाहर जाना होगा वो भी बिना टोपी के। क्या ऐसे नहीं हो सकता कि दो तीन महीने के लिए उसके चारो ओर एक गर्म, अदृश्य बबल बन जाए? बस इतना हो जाए, वो ज़्यादा नहीं मांगता। 


बाहर निकला तो सर्दी के थपेड़े लप्पड़ के माफ़िक लग रहे थे। "और भाई साहब, क्या हाल है?" पड़ोस वाले शर्मा जी ने बत्तीसी निलाकर पूछा।


इतना खुश होने की कौन सी बात है भाई? "अरे भाई साहब, बहुत ठंड है," कहकर भास्कर निकल लिया। 


घर लौटा तो फ़ौरन किचन में गैस जला कर खड़ा हो गया। पहले तो कुछ सेकेंड्स हाथ सेका फिर एक चूल्हे पर दूध और दूसरे पर चाय चढ़ा दिया। शायद नलिनी को पता हो। 


"ये लीजिए नलिनी जी, गरमा गरम चाय।"


"ओह, थैंक्यू, भास्कर जी। शदीद जरूरत थी इसकी।" नलिनी ने लपक कर चाय का कप उठा लिया।


"थैंक्यू छोड़िए, आप तो हमें ये बता दीजिए कि आपने मेरी टोपी को देखा है? कब से ढूंढ रहे हैं पर मिल नहीं रही। 


नलिनी जी मुस्कुरायी और फिर कहा, "जी हां, देखा है।"


"कहाँ?"


"आपके सिर पे।"


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Monday, December 26, 2022

Yaadon Ka Idiot Box With Neelesh Misra Season 7

 




अगस्त की सुबह: तरंग सिन्हा



'बात बे बात पे अपनी ही बात कहता है, मेरे अंदर मेरा छोटा सा शहर रहता है। आप सुन रहे हैं यादों का इडियट बॉक्स विद नीलेश मिसरा, कहानियां जिनमें आप मिलते हैं खुद से...'


हर बार जब मैं यादों का इडियट बॉक्स की ये लाइन सुनती हूँ तो वो मेरे दिल को छू जाती हैं। इस शो
की जाने कितनी कहानियां सुनी हैं मैंने ―कहानियां जिनमें भरे होते हैं ज़िन्दगी के रंग; कहानियां जो आपको अपने साथ लेकर चल पड़ती हैं और जिन्हें सुनते हुए आप पाते हैं सुकून। नीलेश मिसरा जी का कहानी सुनाने का खूबसूरत अंदाज़ इन कहानियों को और खास बनाता है। 
मुझे बताते हुए बहुत खुशी हो रही है कि मैं अब नीलेश मिसरा जी की मंडली का हिस्सा हूं। 
अब इस शो के लिए लिखने का मौका मिला है और ये बात मेरे लिए बहुत मायने रखती है। सबसे खास बात ये है कि मंडली में कहानियों पर चर्चा होती है। कहानियों को सिरे से नकारा नहीं जाता, बल्कि आपको अपनी कहानी के कमज़ोर पहलुओं पर काम करने के लिए प्रेरित किया जाता है, और इस दरम्यान एक लेखक बहुत कुछ सीखता है। अनुलता जी मंडली की क्रिएटिव हेड हैं। साथ ही एक बेहतरीन, अनुभवी लेखिका हैं। और उनके साथ कहानियों पर चर्चा करना, उनके फ़ीडबैक को समझना, उसको ध्यान में रखकर कहानी पर काम करना एक दिलचस्प अनुभव है और ये प्रक्रिया कहानियों को और निखारती है। 




 'Friday Challenge Stories' यादों का इडियट बॉक्स का एक खास सेगमेंट है।
शुक्रवार को 92.7 Big FM पर प्रसारित होती हैं Friday Challenge की छः नन्हीं कहानियां। हम सभी मंडली के सदस्यों को एक वाक्य दिया जाता है और हमें उस वाक्य से शुरू करके एक छोटी सी कहानी लिखनी होती है। ये एक प्रतियोगिता है, जिन छः लेखकों की कहानी सबसे अच्छी होती है, उनका चयन होता है। चैलेंजिंग है, पर मज़ेदार है। अब तक मेरी तीन कहानियां सेलेक्ट हुई हैं। 


और ये है मेरी पहली यादों का इडियट बॉक्स कहानी ―प्रेम-गीत। :) ये कहानियां यूं तो रेडियो पर प्रसारित होती हैं, पर अगर आप वहाँ ना सुन पाएं, या किसी से साझा करना चाहें, तो सारी कहानियां The Slow App पर मौजूद हैं। और हाँ, आप चाहें तो ऐप के 'Participate' सेक्शन में जाकर अपनी कहानियां सबमिट भी कर सकते हैं।

अब तक मेरी दो लम्बी कहानियां आयी हैं। आशा है आगे भी आएंगी। आप सुनिए, जब भी वक्त मिले, और मुझे जरूर बताईयेगा कि कैसी लगी।


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Saturday, November 19, 2022

तुमसे नाराज़ नहीं

 


Image: Nighthawk Shoots, Unsplash


{634 words}


दरवाज़े की घंटी बजी तो मिनी चौंक गयी। इस वक्त कौन हो सकता था? उसने खिड़की से बाहर देखा तो बारिश तेज़ थी। स्ट्रीट लाइट में बूंदें झिलमिला रही थीं।

घंटी फिर बजी तो उसने दरवाज़े पर लगे पीपहोल से झांक कर देखा तो और ज़्यादा चौंक गयी। 'तुम?' उसने दरवाज़ा खोलकर कहा।

'हाँ, तो? नहीं आ सकती मैं तुम्हारे घर?'

'हाँ, आ सकती हो। मतलब इतनी रात को, बारिश भी हो रही है। और अकेली?'

'देर हो जाती है, कभी-कभी,' उसने मिनी की आंखों में झांक कर धीरे से कहा। 'और अकेली?' वो बेसाख़्ता अंदर आ गयी। 'मिनी, मैं कोई बच्ची नहीं हूँ, माँ हूँ तुम्हारी।' 

वो जाकर सोफे पर बैठ गयी और मुस्कुरायी तो जैसे मिनी के एक कमरे का घर भी जवाब में मुस्कुरा दिया। 'तुम झगड़ा कर के आयी थी तो मेरा दिल नहीं लग रहा था,' माँ ने कहा तो मिनी का मन ग्लानि से भर गया। वो वहीं पास पड़ी कुर्सी पर बैठ गयी।

वो पिछले हफ़्ते ही घर से लौटी थी। माँ को उसका यूं बड़े शहर में अकेला रहना पसंद नहीं था। कहती, तुम लड़की हो…हर बार की वही चिखचिख थी।

'तो क्या इतनी अच्छी नौकरी छोड़ दूं और यहां आकर घर बैठ जाऊं? आम अ ट्वेंटी सेवन ईयर ओल्ड वोमन, मैं खयाल रख सकती हूँ अपना,' मिनी ने चिढ़कर कहा था।

'वही तो।' माँ ने अपना दूसरा पासा फेंका। 'अब सत्ताईस साल की हो गयी हो। शादी कब करोगी? बच्चे कब होंगे?'

'हाँ, ज़िन्दगी में कुछ ना करूँ; किसी से भी शादी कर लूं और फिर किचन और बच्चे संभालती फिरूं, तुम्हारी तरह,' मिनी ने तपाक से कहा था। नहीं, कहा नहीं था, उसके मुंह से निकल गया था। माँ का चेहरा कैसे बुझ गया था। पापा भी हैरान होकर उसे देखने लगे थे। मिनी का दिल बैठ गया। 

वो कहना चाहती थी कि 'मेरा वो मतलब नहीं था, कि… आप तो जानते हो कि मैं कितनी जल्दी चिढ़ जाती हूं।' पर वो जानती थी कि अभी वो सब कहना बेमानी था। उसने दिल दुखाया था उनका। पर ये भी जानती थी कि वो उसकी बात दिल में नहीं रखेंगे, माफ़ कर देंगे उसे। हमेशा माफ़ कर देते हैं, शायद इसलिए बदतमीज़ी कर देना आसान होता है।

'अच्छा घर है वैसे तेरा। छोटा सा है पर अच्छा है।' माँ नज़रें घुमाकर इधर उधर देख रही थी। 

'माँ, मैं―' मिनी ने बोलना शुरु किया पर माँ ने टोक दिया। 


'कोई बात नहीं। तब मैं थोड़ी नाराज़ थी पर अब नहीं हूँ। और मैंने सोच लिया है कि अब उस बात पर कभी चिखचिख नहीं करूंगी। सबको अपनी ज़िन्दगी अपनी तरह से जीने का अधिकार है,' माँ ने अपने मरून कलर की तांत की साड़ी के प्लीट्स को ठीक करते हुए कहा। मिनी ने कुछ कहने के लिए मुंह खोला ही था कि माँ ने झट से अपना एक हाथ उठाकर कहा, 'और मैं ये नाराज़गी में नहीं कह रही।' फिर वो मुस्कुरा उठी। 'अच्छे मन से कह रही हूं। मैं तुमसे ज्यादा देर नाराज़ नहीं रह सकती, जानती हो ना?'

मिनी जानती थी। एक मुस्कुराहट उसके होठों पर भी तैर गयी और जैसे मन का भारीपन धुल गया। 'कुछ खाओगी?' उसने पूछा।

'नहीं, भूख नहीं है मुझे।' माँ मिनी को निहार रही थी। मिनी को लगा जाकर गले लग जाए पर वो उठकर माँ के लिए पानी लेने चली गयी। 


उसने ग्लास टेबल पर रख दिया पर माँ ने उठाया नहीं। तब मिनी ने कुछ अजीब सा गौर किया कि माँ इतनी बारिश में आयी थी पर बिल्कुल भी गीली नहीं थी। 


तभी फ़ोन की घंटी बजी। पापा का फ़ोन था। मिनी ने फ़ोन उठाया तो उधर से पापा की थर्रायी हुई आवाज़ आयी। 'मिनी…'


'पापा, क्या हुआ?' उसने घबरा कर कहा और माँ की तरफ़ देखा। माँ की आंखें भर आयी थीं। कुछ अजीब सा था उसकी आंखों में।


'मिनी…मिनी, तुम्हारी मां नहीं रही, बेटा।'


★★★



And it rained...