Monday, January 4, 2016

दर्द का वो नायाब क़तरा...






Image

दर्द का एक नायाब क़तरा छिटक कर 
मेरे दामन में आया 
उसे सहेजा  मैंने,
दिल से अपनाया 
एक छोर से फिसलते अरमानों  को,
कस कर थाम था मैंने 
उसी में ढूँढा था एक सपना सलोना 
छिटकती नर्म धूप,
झील का वो किनारा, अंजाना सा 
वो धीमी मुस्कुराहटें, पहचानी सी 
छन् से टूटा वो सपना 
बस एक पल में, छिन गया मुझसे 
मालूम था मुझे...शायद,
दर्द का वो नायाब क़तरा छिन जाए ग़र कभी,
तो इतना ही दर्द होगा. 





Share/Bookmark

6 Comments:

Yogi Saraswat said...

बहुत खूब

Rajputana kshtriaya Mahasangh said...

Toching

Tarang Sinha said...

@ Yogi Saraswat @ Rajputana KM: Thanks!

rudraprayaga said...

Touching.May your good sapana come true.

Manish Purohit said...

Absolute brilliant...Utkrusht!!!

Tarang Sinha said...

@Rudraprayaga @ Manish: Thank you!

Post a Comment

 
;